मेरे मन के बुलबुले

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anoop pandey


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आलोक का प्रश्न और बाबा आमटे का उत्तर

Posted On: 13 Jun, 2012  
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परदेस से पिया को पाती…..

Posted On: 5 Jun, 2012  
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अँधेरे और चाँद की कश्मकश

Posted On: 3 Jun, 2012  
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करोडपति बनने का आखिरी मौका ……. आई पी एल फिनाले

Posted On: 28 May, 2012  
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एक पाती जे जे और ब्लोगर्स के नाम

Posted On: 21 May, 2012  
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Others लोकल टिकेट में

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विधान सभा में अश्लील वीडियो – Jagran Junction Forum

Posted On: 14 Feb, 2012  
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नेता जी के आई पी ओ

Posted On: 12 Feb, 2012  
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जागरण की अनुचित बहस

Posted On: 13 Jul, 2011  
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अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी……

Posted On: 12 Jul, 2011  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

एक साधू ने पास आये हुए दो आदमियों में से पहले वाले से कहा की आज से पन्द्रह दिनों के बाद तुमको अशर्फियो से भरा हुआ एक घड़ा मिलेगा और दूसरे कों कहा की आज से ठीक पन्द्रह दिनों के बाद तुमको फांसी लग जायेगी .... पहले वाला यह सुन कर रिलेक्स होकर मौज मज़े में डूब गया और दूसरा भक्ति और ध्यान तथा दान धर्म करने लग गया .... पंद्रहवे दिन जब दोनों दोस्तों जंगल में जा रहे थे तो पहले वाले कों एक अशर्फी मिली और दूसरे वाले के पैर में कील चुभ गई ..... साधू बाबा की दोनों ही बाते झूठी निकल जाने पर दोनों ही दुबारा से उनके “दरबार” में हाज़िर हुए ..... तब उन्होंने पहले वाले से फरमाया की तुम्हारे कुकर्मो के कारण तुम्हारी किस्मत में लिखा हुआ एक घड़ा मात्र एक अशर्फी में बदल गया और दूसरे से कहा की तुम्हारे सद्कर्मो के कारण ही सूली शूल में बदल गई (इशारों कों अगर समझो – राज़ कों राज रहने दो ) http://krishnabhardwaj.jagranjunction.com/2012/06/17/%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A5%87-%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%AA%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE/

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

अनूप जी नमस्कार, कई बार मुझे भी लगता है मेरे साथ ही क्यों? जब तक हम इसके साथ इश्वर को जोड़ेंगे तो हम इसी प्रकार भ्रमित होते रहेंगे. जबकि यह तो नियति का विधान है किसी के साथ भी ऐसी घटनाएं हो सकती है.इसके लिए किसी को दोष देने का अर्थ नहीं है. एक उदाहरण इस तरह का मेरे पास भी है. एक हमारे अधिकारी थे. कभी किसी का आर्थिक नुक्सान नहीं किया, कभी किसी को अकारण घर से दूर नहीं किया. सबकी समस्या पर रहम दिली से काम किया. किन्तु उनके चार बच्चो दो बेटे दो बेटियाँ सभी की अच्छी जगह शादियाँ कर दी. उनकी छोटी बेटी पति और एक बच्चे सहित सड़क किनारे एक ट्रक एक पलटने से ख़त्म हो गए सदमा लगा उनको उन्होंने बिस्तर पकड़ लिया कुछ जी दिनों बाद छोटे लड़के की दुर्घटना में म्रत्यु हो गयी, यह सदमा वह बर्दाश्त नहीं कर सके और चल बसे उनकी बड़ी लड़की इस सदमे से दिमागी संतुलन नहीं रख पा रही है आज करीब चार वर्ष हो गए हैं. और अब दो दिन पहले ही उनकी पत्नी जो चलने फिरने में कठिनाई महसूस करती थी दामाद में साथ कार में जा रही थी एक ट्रक से एक्सीडेंट के कारण हाथ पैर की हड्डी तुडवा बैठी. अब इसे क्या कहेंगे?

के द्वारा: akraktale akraktale

के द्वारा: anoop pandey anoop pandey

के द्वारा: anoop pandey anoop pandey

अनूप जी सादर नमस्कार, आपका सुन्दर हास्य, ओह! सॉरी.....शोध-पत्र. आपकी सुन्दर हंसमुख, चंडी, भवानी, विघ्नहरता- स्थायीपाहुना नाशक, दूरदर्शन प्रेमी, आस-पड़ोस समाचार-पत्र(यह गुण शायद प्रिंटिंग में छुट गया) सामान बाई को प्रणाम कर ऐसा प्रतीत होता है जैसे सारे जगत की बाइयों को प्रणाम का पुन्य लाभ मिला हो. वैसे हमारे यहाँ जब भी किसी बाई का कार्यकाल लंबा होने लगे माताश्री विकल्प का इंतजाम करके उसको रामराम कर लेती हैं, भले घूम फिर कर वह फिर आ जाए और श्रीमतीजी की कृपा से वह बाई कभी जान ही नहीं पाती की इस घर में भी कांच के बर्तन है.मगर फिर भी बाई भले स्थायी ना हो बरतनों पर उसके गुस्से का इजहार चिरस्थायी रहता है. आपके सुन्दर आलेख पर बधाई.

के द्वारा: akraktale akraktale

राधे राधे राजकमल जी...... अब साहिब जो पुराने रिश्तेदार हैं उनके सामने तो कुछ छिपाने का मतलब भी नहीं है क्यों की वो लोग एक दो दिन रुकते हैं. पर एक दो घंटे वाले उसे हमारा पडोसी ही जानते होंगे. कभी कभी ये ध्रस्टता हमारे ड्राइवर साहिब कर जाते हैं तो अगले दिन सुबह उससे गाली का प्रसाद भी पा जाते हैं. रही बात खूबसूरती की तो शादी के बाद जब हमने पहले बार अपनी श्री मति जी के सामने शेखी बघारते हुए कहा की मांग लो जो मांगना है ...... पहले से ही तथास्तु कह देते हैं तो उन्होंने हमारी वो आँखें मांग लीं जिन्हें हम राह चलते सेक लिया करते थे...........और शादी के बाद वो सभी पडोसने जो नाम से बुलाती थी अब राखी ले कर आने लगी हैं. तो भाई इस प्रश्न का उत्तर न तो हा हैं और न 'ना' बल्कि 'कह नहीं सकते' है. बाकी आप जैसा व्यंगकार जिस व्यंग को अच्छा कह दे तो अब किसी और प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं. बहुत बहुत आभार.

के द्वारा: anoop pandey anoop pandey

आदरणीय पांडे जी, सादर अभिवादन! भला सच्ची घटना या आँखों देखी कानो सूनी से भला कोई इनकार कर सकता है. किसकी शामत आयी है जो इस ब्लॉग को मजाक में ले सकता है! .. यहाँ तो स्थिति यह है की मेहमान के आने की खबर से ही बेचारी बीमार हो जाती है.जैसे ही मेहमान चले जाते हैं दवा की पुर्जी के साथ आ जाती है. साप्ताहिक अवकाश तो उसे मिलना ही चाहिए नहीं तो उसका ही आदमी बाई यूनियन में जाकर शिकायत भी लगा देगा फिर हड़ताल मेमसाहब का खस्ताहाल नहीं तो हमें ही घर के कामों में हाथ बंटाना पड़ता है, दफ्तर से चुटी के लिए कोई बहाना करना पड़ता है ..... भगवान् उसे सदा स्वस्थ रखें यही दुआ करता हूँ आपके ब्लॉग के साथ पूरी पूरी सहमती रखता हूँ .. प्रणाम .. आपके आशीर्वाद का आकांक्षी!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: akraktale akraktale

अनूप जी सादर, आपका कोई आलेख मैंने पहले कभी शायद ही पढ़ा हो. मगर आज जेजे और ब्लोगर्स का नाम होने से मैंने इसे पढ़ा और सच मानिए मुझे आपका सुलझा रूप बहुत ही पसंद आया.इसके लिए आपको अतिरिक्त बधाई. सच कहा है आपने कई दिनों से मंच को कुछ ब्लोगर्स ने मंच के स्तर जितना नीचे गिराया है वह, पिछले एक वर्ष से अधिक हो गया मुझे इस मंच पर, मैंने कभी नहीं देखा है. मुझे आशा थी की जेजे इस पर कोई अच्छा हल निकालेगा किन्तु ऐसा देखने को तो नहीं मिला.तभी आपका कहना भी सही लगा की मंच आपका है जेजे का नहीं,आपको ही सम्हालना है.वरिष्ठ ब्लोगर्स द्वारा काफी प्रयास भी किया गया किन्तु..... खैर अब इस पर कलम घसीटने का क्या अर्थ. आशा है आपकी इतनी ही उन्नत सोच के साथ आपके आलेख भी मै पढ़ पाउँगा. आभार.

के द्वारा: akraktale akraktale

"डर तो बस पिता जी और पत्नी जी से लगता है बाकी किसी से क्या डरना"  पिता जी और पत्नी से दर इसलिए लगता है क्योंकि उनसे प्रेम नहीं है.....प्रेम अगर प्रकाश है तो डर अंधकार.....प्रेम और डर दोनों का मिलन संभव नहीं है...... "जहा तक इज्ज़त की बात है तो वो तो दे कर ही मिलती " 1.अगर बात ऐसी है तो बात राजनीति की हो गई..... 2. इज्ज़त/प्रेम होगा हमारे पास तब तो देंगे......जो है ही नहीं वो देंगे.....कैसे.......कौन किसको इज्ज़त देता है.....बस अभिनय करतें है लोग......भीतर मन कर रहा होता है गली देने का ऊपर से मुस्कुराते रहते है...लोग.......हम इतने सूक्ष्म रूप से पाखंडी हो चुके है कि हमे पता भी नहीं चलता है कि हम पाखंडी है...... जो ख़ुद कि इज्ज़त नहीं करता है ख़ुद से प्रेम नहीं करता है....ख़ुद की तारीफ नहीं करता है.....वो दूसरों की क्या करेगा......किसी की चाटुकारिता करना उसको इज्ज़त देना नहीं है.......

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

के द्वारा: anoop pandey anoop pandey

अनूप पांडे जी, नमस्कार,..... किसी कमजोर शायर ने गया है, "अगर ये डर है तुझको वो तुम से तू कर दे, तो मशवरा है मेरा ख़त्म गुफ़्तुगु कर दे..." आपकी विचार धारा भी मुझे कुछ इस तरह की ही प्रतीत हो रही है....लेकिन कब तक कच्चे मकान मे रहिए गा.....? 5000 साल हो गए इस तरह बंद रहते रहते......... बाहर निकलिए और खुली हवा मे साँस लीजिए......कब तक छुद्र बुद्धि बन हाय संस्कार हाय संस्कार करते रहिएगा....अब समय आ गया की हम बुद्धिमान बने.......आप ख़ुद को छुद्र बुद्धि कहते है...कोई ख़ुद को मूरख कहता तो कोई किसी के चरणों की धूल है.....कब तक ख़ुद को कोसते रहिएगा.....धूल बन के जीना भी कोई जीना है....और ध्यान रहे धूल पर कोई दया भले ही कर दे लेकिन इज्ज़त कभी नहीं करेगा.......ऐसी इज्ज़त की क्या मोल जो ख़ुद की निंदा करके आती हो....आदमी जब सच मे ही इज्ज़त के काबिल हो सकता हो इज्ज़त की भीख माँगने की क्या ज़रूरत........। झटक दीजिए ये संस्कारों की धूल....और इन सड़े-गले दोहों को....ये सब कमज़ोर आदमी की ईज़ाद...है....... “मैं अपने आज से हारा कोई बाजी नहीं होता, अगर लिपटा हुआ मुझसे मेरा माजी नहीं होता, ज़रूरी है कदूरत भी दिलो से साफ हो पहले, फकत सर के झुकाने से ख़ुदा राजी नहीं होता…..”

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

के द्वारा: anoop pandey anoop pandey

आदरणीय अनूप जी ..... सादर नमन ! सबसे पहले तो इस बेहतरीन लेख के लिए इसके लेखक को मेरी तरफ से भी मुबारकबाद बहुत याद करना पड़ा की आप वास्तव में थे कौन ?..... फिर आपकी सभी पोस्ट पर अपने और दूसरे ब्लागर्स के सारे कमेन्ट पढ़े तब कहीं जाकर आपकी बाबत पता चला ..... आपको कहीं पर कभी हम लोगो ने कभी भूलवश कुछ समझाने की चेष्टा अवश्य की होगी – लेकिन कोई झिड़की ना बाबा ना ! अब देखिये ना आप भी तो जागरण को कुछ समझा रहे है तो क्या इसको भी आपके द्वारा जागरण को दी गई घुड़की मान लेना चाहिए – नहीं ना – की हाँ - हा हा हा हा हा मुझको तो ऐसा लग रहा है की आप शायद अपनी राजकमल सास के बारे में अपनी होने वाली और हो चुकी बहुओं से मेरे द्वारा किये गए अतीत में जुल्मों सितम की बाते इसलिए बताना चाह रहे है ताकि आपको भी अपनी बहुओं को झिड़कने का अधिकार मिल जाए और वोह सभी बिना कोई चूं चपड़ किये हुए आपकी झिड़किया + घुड़किया प्रसाद समझ कर ग्रहण कर जाए :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-)

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

के द्वारा: vikramjitsingh vikramjitsingh

किन्नर हो हर क्षेत्र मे है । दिल्लेमे बैठे किन्नरो को किस श्रेणी मे लाओगे । हर ५ साल बाद आपके पास आ जाते है --ए राजु --देना -- । बोम्ब फटने के बाद मुम्बई मे बडे बडे किन्नर आ धमके । एक बोलता है ३०-३२ महिनो तक मुम्बई मे बोम्ब नही फटा हमारी तालियो की वजह से । हमारी ताली ने कमाल दिखा दिया, हमारी ताली सिस्टम फेल नही है । किन्नर के सरदार ने कहा मै आपके दुख से खुद दुखी हु , आगे कोशीश की जायेगी की अब बोम्ब ना फटे । भाई अब क्यो , पेहेले क्यो नही । एक नये कीन्नर की ताली तो भुवनेश्वर से मुम्बई तक सुनाई दी । उसने कहा ९९ टक्का घटना रोकी जा सकती है लेकिन १ टका तो झेलना ही है । बोम्ब फोडनेवाले पेहले जानवर थे आज वो भी किन्नर हो गये । पेहले तो वो छाती ठोक के बताते थे कि ये काम हमारा है । आज घुस गये है अपने अपने बील मे ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

के द्वारा: anoop pandey anoop pandey

आदरणीय जागरण जंक्शन संरक्षक मंडल, सादर अभिनन्दन , आपकी प्रतिक्रिया पर कुछ आपत्तियां है.....पहली तो ये की यदि आप जागरन जंक्शन परिवार है तो हम सभी ब्लोगर क्या हैं? आप और हम मिल कर इस परिवार का निर्माण करते हैं.....अतः यदि हमें गृह निकाला मिला है तो स्पस्ट करें. दूसरी बात मंच सभी मुद्दे न रख कर सिर्फ चालू मुद्दे ही बहस के लिए प्रस्तुत करता है. यद्यपि जागरण के राष्ट्र धर्म और भारत राष्ट्र के उत्थान की मंशा को ले कर कोई सवाल नहीं है फिर भी आपसे और सटीक एवं राष्ट्र चिंतन से भरपूर मुद्दों की अपेछा पाठक समूह रखता है. फोरम में प्रस्तुत विषय प्रायः विवाद या मतभेद की गुंजाइश वाले हों ये तो ठीक है पर प्रमुख आपत्ति उनके शीर्षकों को ले कर होती है जैसा की निशा मित्तल जी भी कह चुकी हैं. शीर्षक अक्सर दुराग्रह प्रकट करते हैं जिनसे की बचना चाहिये.यदि मंदिर धनवान जनता निर्धन के स्थान पर धार्मिक स्थल धनवान जनता निर्धन शीर्षक होता तो आज जैसी परिस्थिति न आती.तथा फोरम आहूत करने के लिए दी गयी विषय वस्तू से मंच की राय तटस्थ न रह कर एक ओर झुकी लगती है....अतः यदि मंच स्वयं एक पक्ष है तो उसे छोड़ा कैसे जा सकता है. महोदय मैंने अनुचित शब्द का उपयोग किया है न की अनैतिक या अवैध. अनुचित इसलिए की जागरण का आयास सिर्फ उत्तर भर में है और केरल के लोगों की भावना की चर्चा करना सिर्फ कयास लगाने जैसा है......ये विषय फोरम पर उठा कर आप पाठकों के बीच गरमा गरम बहस का मज़ा तो ले सकते हैं पर उसकी सार्थकता क्या होगी ये कहना मुश्किल है. जिन लोगों से ये विषय सीधे जुड़ा है उनमे से कोई अपना पक्ष यहाँ रख पायेगा उसकी सम्भावना न्यूनतम है. और यदि कोई सटीक और युक्तियुक्त मत निकला भी तो उससे होगा क्या? क्या दूसरे पक्ष तक ये बात पहुचेगी की इस फोरम का निर्णय आपके विपरीत है.....यदि अंत में होना कुछ भी नहीं है तो फिर फोरम का फायदा ही क्या? और फिर ऐसे विषय की सार्थकता भी क्या जो पाठकों के धार्मिक या सामाजिक मनोभावों से छेड़ छाड़ करे. बंधुवर जागरण प्रति दिन कई लोगो के विचारों को भोजन प्रदान करता है......लेखों के द्वारा हम अपनी मानसिकता का निर्धारण करते है. अतः वैचारिक सुचिता बनाये रखने की जो जिम्मेदारी आप पर शीर्ष स्थान में आने के बाद आ गयी है उसका भार महसूस करें तो ऐसी चूक होने की सम्भावना घट जाएगी. जागरण सन ८० से घर पर प्रति दिन आ रहा है अब तो भावनात्मक जुड़ाव हो गया है......इस वजह से उसे चूकते देख भाषा में तल्खी आ गयी.......उसके लिए क्षमाप्रार्थी हूँ. आभार अनूप कुमार पाण्डेय

के द्वारा: anoop pandey anoop pandey

प्रिय अनूप जी .....नमस्कार ! जितना मैंने इस मंच पर जागरण के बारे में लिखा है शायद ही किसी और ने लिखा हो (चाहे सुधार की कामना से ही ) लेकिन इस बार मैं आपकी एक बात से इत्तेफाक नहीं रखता हूँ की जागरण के पास ज्यादा धन है ..... जहाँ तक मैंने देखा है और महसूस भी किया है उसके अनुसार *जागरण के पत्रों का मूल्य दूसरे पत्रों के मुकाबले आधा तो है ही ..... *उसमे विज्ञापन भी नाममात्र ही होते है ...हाँ यह अलग बात है की मसालेदार खबरों की कमी तथा खबरों की उचित सेटिंग तथा बेहतर प्रस्तुति के अभाव में बिक्री कम होती है ..... और जहाँ तक मुददे की सार्थकता का सवाल है तो एक बार जागरण से इस से मिलते जुलते सवाल चातक जी ने भी किये थे ..... हम लोग ऐसे ही सवाल करते रहेंगे लेकिन यह मुददे ऐसे ही चलते रहेंगे +अनसुलझे रहेंगे +अपनी स्वभाविक गति से चलते हुए अपने पूर्व निर्धारित अंत की तरफ बढ़ते रहेंगे ..... धन्यवाद :) :( ;) :o 8-) :|

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

अनूप भाई सर्वप्रथम तो आपको सीधे खरे और सटीक लेख पर हार्दिक बधाई, अब बात जागरण की जिसने यहाँ अपना उत्तर (सफाई) प्रस्तुत की आकर| परस्पर भिन्न मत विचारों बाले विषय प्रस्तुत करने करना मीडिया का धर्म है और इसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता किन्तु जब कई बार विषय एकतरफा हो जाएँ अथवा उनके तल में कोई आधार ही न हो क्या तब भी उसे सार्थक ही कहा जाना चाहिए.? मंदिरों की जो संपत्ति भक्तो के दान से एकत्रित हुई हो उसपे या तो भक्तों का ही अधिकार हो सकता है अथवा मंदिर का ही..! सरकार और अल्पसंख्यक कल्याण विभाग का हक़ वहां कहाँ से हो सकता है.? अपनी संपत्ति का उपयोग कहाँ और कैसे हो यह मंदिर या भक्त ही तय करेंगे या सरकार के वोट तृषित नेता..? पद्मनाभ जैसी अमूल्य पुरातात्विक महत्व की धरोहर को अनुचित जड़ पड़ी संपत्ति बताने वालों को हमारे पर्वत नदियाँ प्राचीन इमारतें अजंता एलोरा की गुफाएं सब कुछ बेचने की बहस करनी चाहिए इसके खरबों विदेशी डालर विदेशी बाजार में मिल जायेंगे........ अंत में संक्षिप्त में जागरण के माध्यम से मीडिया से एक सवाल..- इन सब तथ्यों के बाद भी आपकी बहस सार्थक मान ली जायेगी किन्तु हजारों सवालों के बाद भी बहस के केंद्र में हिन्दू मंदिर और उनकी संपत्तियां ही क्यों मस्जिद मदरसा वक्फ और चर्च की अकूत संपत्तियां क्यों नहीं..? जब तक इस यक्ष-प्रश्न का ईमानदार उत्तर नहीं दिया जाता सारी सफाई बेईमानी से अधिक कुछ नहीं..! पाठक इस विषय पर अधिक जानना चाहें तो अधिचर्चित में मेरा लेख हिन्दू निशाने पर देख सकतें हैं|

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

आदरणीय अनूप पाण्डेय जी, जागरण जंक्शन फोरम द्वारा जारी किए गए मुद्दे पर आपके सवालों के समाधान प्रस्तुत करना आप सहित सभी पाठकों के हित में है. अतः निवेदन है कि नीचे दिए गए समाधान को अवश्य पढ़ें: 1. जागरण जंक्शन फोरम जनहित और राष्ट्रहित को दृष्टिगत रखते हुए सार्थक वाद-विवाद का मंच है. 2. स्वभावतः फोरम में प्रस्तुत विषय प्रायः विवाद या मतभेद की गुंजाइश वाले होते हैं. 3. यदि कोई मुद्दा जिस पर अनेक मत हो सकते हैं, तो सटीक और युक्तियुक्त मत क्या है, इसे दुनियां के सामने लाना फोरम का अभीष्ट है. 4. लोकतांत्रिक राष्ट्र की भावना के अनुरूप पक्ष और विपक्ष के मत को सामने लाकर ही सर्वाधिक सही समाधान को तलाशा जा सकता है. 5. तथ्यों से मुंह फेरने की बजाय उसका हिम्मत से सामना कर सच को प्रतिष्ठापित करना ही वास्तविक बौद्धिकों का धर्म है और ऐसा करके ही छद्म वेशधारियों का पर्दाफाश किया जा सकता है. 6. यही कारण है कि मंच ऐसे सभी मुद्दों को जनता के सामने रखता है जिन पर बहस हो, गैर-राष्ट्रवादी व देशद्रोही विचार वालों को बहिष्कृत किया जा सके, राजनीति व समाज में नैतिक आचार संहिता को बल मिले व अंतिम तौर पर भारत राष्ट्र का गौरव बढ़े. जागरण जंक्शन पर ब्लॉगिंग के लिए आपका आभार धन्यवाद जागरन जंक्शन परिवार

के द्वारा: Jagran Junction Forum Jagran Junction Forum

के द्वारा: anoop pandey anoop pandey

बहुत सार्थक लेख!! पहली बात तो यह जागरण एक अखबार है या न्यायाधीश ?और दूसरी बात की लोगों को उपदेश करने से पहले खुद क्या किया ?क्या किसी अखबार के दफ्तर के बाहर प्यायु लगी है जो प्यासे लोग पानी पी सकें क्या कोई पानी की हौज लगी है जो प्यासे पशु पानी पी सकें ?क्या कभी सोचा है पाखंडी ज्योतिषियों , तांत्रिकों ,सेक्सोलोजिस्टों,मित्र बनाओ आदि व्ग्यापनों से जनता को कितना नुकसान होता है/ ज्यादातर अखबार नकारात्मक ख़बरों से ही लबालब होते हैं क्या देश में कहीं कुछ अच्छा होता ही नही ? देश में एक मन मोहन सिंह ही ईमानदार हैं और सारे बेईमान ? देश में एक ही पार्टी है कांग्रेस और एक ही परिवार है सोनिया गाँधी का ,बाकी तो सारे यहाँ ऐसे ही बस गये हैं/ राहुल गाँधी यहाँ का युवराज है और शेष भारत उसका गुलाम / यह सब मीडिया का परचार और प्रसार है जिसके कारण अपराधियों को लोकप्रियता मिल रही है /मंदिर का खजाना किसका है इसका ठेका मीडिया का है क्या ?मंदिर के खजाने को तो देख रहे हो नेताओं के खजाने को क्यों नही ? राष्ट्रगान में आपत्ति जनक रूप से किंग जार्ज पंचम को भाग्य विधाता गाते गाते तरेसठ साल हो गये क्या आज भी वही भारत का भाग्य विधाता है? केवल एक परिवार के आगे सारा मीडिया नतमस्तक है पता नही क्यों ?शायद विकिलीक्स से खुलासा हो सके.परन्तु कब ???

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शशिभूषण जी जड़ रूप में तो इस संपत्ति से ज्यादा सोना देश के लोगो के घरों में है...उससे भी ज्यादा काला धन है जो की प्रवाहित तो है पर अपने देश में नहीं.....बात यहाँ धर्म की है. लोगो के विश्वास की है.....मै इस बात का हिमायती नहीं की वो पैसा वैसे ही पड़ा पड़ा सड़ता रहे पर इस बात का विरोधी अवश्य हूँ की किसी वर्ग विशेष के धार्मिक स्थलों की संपत्ति का सरकारी अधिग्रहण हो जब की सरकार में उस पैसे का क्या होने वाला है वो सभी को पता है. मंदिर के नियमो में ये व्यवस्था थी की आपदा के समय तहखाना खोला जाये......इसे सम्प्रदाय विशेष का बचत खाता समझा जा सकता है.........और कृपा करके ये बताएं की करोंडो का भला किस प्रकार हो सकता है? माध्यम तो आखिरकार सरकार ही बनेगी तो फिर दान के पैसे का बंदरबांट तय है. जो भी करना है उसे ट्रस्ट को करने दीजिये......जब इतना पैसा इनकम टैक्स से आता है तो तो देश का भला आज तक न हुआ.....हाँ कुछ बहुत नातों का जरूर से हुआ तो इस पैसे से देश का भला हो जायेगा कैसे मान लें. दूसरी आपत्ति इस बात से है की सिर्फ मंदिर और साधू संतों के पैसे पर ही नज़र क्यों? आजमगढ़ में पेट्रो डालर से बनी आलिशान मस्जिदों, दूसरी जगहों की मजारों, केरल से ले कर बम्बई तक के चर्चों , उनसे संचालित स्कूलों की बात क्यों नहीं? और साहब जिन धनाधीशों के व्यापार चल रहे है क्या उनके पास कुछ भी नहीं? जीविका तो रामदेव के व्यापार से भी कई लोगों की चल रही है......फिल्म स्टारों क्रिकेट खिलाडियों के पास भी तो बहुत पैसा है उससे भी क्या बहुत से लोगों की जीविका चल रही है.....

के द्वारा: anoop pandey anoop pandey

के द्वारा: anoop pandey anoop pandey

अनूप पाण्डेय जी किन्नरों के बारे में यथार्थ परक जानकारी और सुन्दर विषय उठाया आप ने एक बार तो ये चुनाव भी लड़ा था -कुछ जगह कुछ काम में व्यस्त हो कमाई भी करते हैं -कुछ न कुछ इनके विषय में भी सोचा जाना चाहिए -हे की दृष्टि से न देखा जाए -और ये गलत काम में न लगें तो कुछ बात बने ...धन्यवाद शायद मध्य प्रदेश में एक अच्छी शुरुवात हुई थी की महिला हॉस्टल का चौकीदार किन्नरों को बनाया था……पर अभी भी ये एक बड़ी आबादी है जो की अभिशप्त जीवन बिता रही है जिसमे की उसका कोई दोष नहीं. क्या आपने कभी किसी किन्नर की शव यात्रा देखी है? मैंने भी नहीं देखी बस सुनी है की आधी रात को शव को घसीटते , चप्पल जूतों से पिटते हुए निकालते है की दोबारा ऐसी योनी में मत आना…

के द्वारा:

अनूप जी, किन्नरों के जीवन पर दृष्टि डालने वाले शायद आप पहले ब्लोगर है और उनकी समस्याओं को प्रकाश में लाने के लिए आप बधाई के पात्र है| किन्नरों की जीवन शैली से काफी परिचित रहा हूँ मैं लेकिन कभी इस विषय में लिखने की हिम्मत नहीं जुटा पाया| इनकी जबरन उगाही तो सभी देखते हैं लेकिन इनका दर्द और इनकी सेवा कोई नहीं समझता| मैंने किन्नर का जनाजा उठते भी देखा है और उनकी मानवीय संवेदनाओं को भी महसूस किया है| एक पहलू आपसे छूट गया| अक्सर किन्नर गरीब बच्चों को गोद भी लेते थे और उनकी शिक्षा-दीक्षा व देख-रेख भी करते थे लेकिन बच्चा युवा होते ही अपनी दुनिया में लौट जाता और उन्हें सिर्फ आंसू दे जाता| दोनों मजबूर होते थे कोई गिला भी नहीं कर सकता| अब तो ये किसी को गोद भी नहीं लेते| महलों में तो बाकायदा इन्हें रानियों और राजकुमारियों की सुरक्षा के लिए भी नियुक्त किया जाता था लेकिन नवाबों और रजवाड़ों के समाप्त होने के साथ ही इनका कोई हाल पूछने वाला भी न रहा| हमारे बुजुर्गों की तो सख्त हिदायत रही है की कोई भी किन्नर को नाराज न करे, वे असंतुष्ट हो कर न जाएँ क्योंकि ये निरपेक्ष है और इनकी दुआ भी लगती है और बद्दुआ भी| काश कि हम इन रिवाजो को ही मान कर उनके लिए संवेदन शील रह पायें! आमीन!

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भारत का बहुत भद्दा चेहरा आपने बता दिया । किन्नरो ने अपना समाज बना लिया है या बनाने को मजबूर किया है । ईस के कारण ऐसे बच्चे का जन्म होते ही वो समाज जबरदस्ती बच्चे को उठा ले जाते है या भेज दिया जाता है । अन्धा , पागल या कोई अन्य पन्गुतावाला बच्चा पूरी जिन्दगी अपने बाप के साथ रेहते है । उसके लिये अलग समाज नही बनाये गये है । जातियता कि खामी भी पन्गुता ही है । वो भी अपने बाप या भाई-बेहन के साथ रेहने का अधिकार रखता है । वो किसानी भी कर सकता है , अपने बाप की दुकान भी चला सकता है , ईतनी तो ताकत है उसमे । पढ-लिख जाये तो नौकरी भी कर सकता है । सरकार हे ये जबरदस्ती मिटा सकती है । लेकिन मुरख सरकार ने खूद किन्नर समाज को मान्यता दे दी । आबादी की गिनती मे उन को अगल गिना गया । कुदरत ने मानव प्राणी कोइ तीसरी जाती नही बनाई । हा उसकी भुल से मानव के अन्गोमे विक्रुति रेह गई । लेकिन वो मानसिक तोर पे स्त्री या पुरुष ही है । आज डोकटरी विज्ञान ये शारीरिक खामिया दूर करने को सक्षम है । किन्नर को स्त्री या पुरुष बना सकते है । ईस का खर्च सन्थाए उठा सकती है, अगर ईरादा हो । बुदरत की दुसरी भुल के शिकार जो शरीर से तो पूर्ण स्त्री या पुरुष है लेकिन मनसिकता मे खराबी रेह गई है । पुरुष अपने को पुरुष मानने को तैरार नही स्त्री अपने को स्त्री मानने को तैयार नही । लेकिन उनको अपने माबाप के साथ रेहने का पढ-लिखने का मौका मिल गया । आज वो ही लोग अपने नये समाज की रचना करने मे लग गये है । ( गे समाज, लेस्बियन समाज ) किन्नर बच्चे को ऐसा मौका नही मिला । ये सामाजिक भुल है समाज को ही अपनी भुल सुधार नी होगी ।

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क्या इस कदर गिर गएँ हैं हम की जिस पिता ने हमें जिन्दगी भर पाला उसके लिए तीन से चार घंटे तक नहीं हमारे पास अंतिम समय में चिता के पास शोक करने को? दसवें के बजाये तिराता शुरू कर दिया…….बरखी और तेरहवीं साथ में कर दी,दसवें पर सर मुडवाने के बजाये बस छोटे करवालिये, चलो मान लिया एक बार की समय या साधनों की कमी थी , पर ये तो हद ही हो गयी की पिंड प्रवाह कर के तिलांजलि देने को पुत्र तक भी न रुकें …….अब शायद कुछ दिनों बाद घरों या अस्पतालों से मूवर्स एंड पैकर्स और शमशान घाट सोसाइटी के संयुक्त सहयोग से सीधे बुकिंग की जा सकेगी की आप घर पर ही रहें घर से ले कर घाट तक सब कुछ कर के अस्थि कलश आपके घर तक पहुच जायेगा……लकड़ी के प्रकार और चितादाह्न की अन्य व्यवस्थाओ को ले कर शायद एक मीनू कार्ड भी बना दिया प्रिय श्री पाण्डेय जी इस पोस्ट को मुझे कई बार पढना पड़ा ,पर मेरा मन अभी भी नहीं भरा ,सच ये बुलबुले तो बस पढने लायक ही है | बधाई , शुभकामनाये , मुबारक |

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