मेरे मन के बुलबुले

Just another weblog

30 Posts

241 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 4247 postid : 82

जागरण की अनुचित बहस

Posted On: 13 Jul, 2011 में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

मंदिर धनवान जनता निर्धन……..ये जागरण की फोरम नवीनतम मुद्दा है……क्यों भाई? क्या आपकी निगाह दान पर भी है…..उसमे भी राम देव श्री श्री रविशंकर और आशा राम जी को भी घसीटा…..रामदेव के लिए पूछ भी लगाईं है की वो पैसा व्यापार का है…..तो साहब प्रश्न ये है की जागरण के मालिकाना हक रखने वालों के पास भी इतना पैसा तो होगा ही की हज़ार गरीबों का भला हो सके…….टाटा और अम्बानी के पास भी, तो उनकी बात क्यों न करो……मंदिर या साधू संतों ने जबरन वसूली या भ्रष्टाचार से पैसा नहीं एकत्र किया……..तो फिर ये बहस किस लिए? तिस पर भी तुर्रा ये की सार्थक विमर्श है ये……..महोदय कृपया स्पस्ट करें की अर्थ क्या है……..सार्थक या निरर्थक ये बाद में सोचेंगे
पैसा बांटने की बात आती है तो .क्या सरकार सिर्फ हिन्दुओं को उनका धन बाट सकती है?….तब ये मुद्दा संवेदनशील हो जायेगा……..और फिर आपको मसाला मिल जायेगा अखबार बेचने के लिए…… क्यों की देश के हिन्दुओं ने देश की सरकार को दान नहीं दिया तो सरकार कौन होती है उस पर फैसला देने वाली या उसका उपयोग करनेवाली……यदि ऐसा कुछ करना है तो भगवान् पद्मनाभ के सारे भक्तों से पुछा जाये की उनके दान किये धन का क्या करना है. अगर ये संभव नहीं तो जिनकी सुपुर्दगी में ये पैसा है वो ही इस निर्णय को लेने के सही अधिकारी हैं
कभी ये प्रश्न क्यों नहीं उठा की वेटिकन के पास कितना पैसा है ? या जब सोमालिया में हजारों मुस्लिम भुखमरी से मर रहे थे तो अरब के शेख की ठोस चाँदी की कार मक्का से मदीना के बीच घूम रही थी. इस पर भी प्रश्न होने चाहिए…..
दैवी आपदा के समय उस पैसे का इस्तमाल कैसे हो ये फैसला उस ट्रस्ट के विवेक पर छोड़ा जा सकता है पर तब जिम्मेदारी सभी धार्मिक स्थलों की होगी सिर्फ मंदिरों की नहीं ……..और यहाँ तो समस्या और भी जटिल है……मदिर में मिले धन का ज्यादातर हिस्सा एक ही परिवार का है……अब जब की धन और पुरातन मूर्तियाँ दुनिया और सफेदपोश मगरों की नज़र में आ चुकी हैं तो कृपा करके धन की सुरक्षा और सरकारी नुमाइन्दों से मंदिर की संपत्ति कैसे बचाई जाये इस पर बहस आहूत करें. इस प्रकार की बहस जो समाज के एक वर्ग की भावनाओं को भड़काती हो जागरण जैसे मंच पर शोभा नहीं देती.

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

18 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

nishamittal के द्वारा
July 14, 2011

अनूप जी चातक जी के तर्क से सहमत हूँ मैं जागरण से अपेक्षाएं जनजागरण लाने की हैं .धार्मिक स्थल धनवान और निर्धन जनता उपयुक्त विषय होना चाहिए था.

    anoop pandey के द्वारा
    July 15, 2011

    निशा जी आभार

Rajkamal Sharma के द्वारा
July 13, 2011

प्रिय अनूप जी …..नमस्कार ! जितना मैंने इस मंच पर जागरण के बारे में लिखा है शायद ही किसी और ने लिखा हो (चाहे सुधार की कामना से ही ) लेकिन इस बार मैं आपकी एक बात से इत्तेफाक नहीं रखता हूँ की जागरण के पास ज्यादा धन है ….. जहाँ तक मैंने देखा है और महसूस भी किया है उसके अनुसार *जागरण के पत्रों का मूल्य दूसरे पत्रों के मुकाबले आधा तो है ही ….. *उसमे विज्ञापन भी नाममात्र ही होते है …हाँ यह अलग बात है की मसालेदार खबरों की कमी तथा खबरों की उचित सेटिंग तथा बेहतर प्रस्तुति के अभाव में बिक्री कम होती है ….. और जहाँ तक मुददे की सार्थकता का सवाल है तो एक बार जागरण से इस से मिलते जुलते सवाल चातक जी ने भी किये थे ….. हम लोग ऐसे ही सवाल करते रहेंगे लेकिन यह मुददे ऐसे ही चलते रहेंगे +अनसुलझे रहेंगे +अपनी स्वभाविक गति से चलते हुए अपने पूर्व निर्धारित अंत की तरफ बढ़ते रहेंगे ….. धन्यवाद :) :( ;) :o 8-) :|

    anoop pandey के द्वारा
    July 14, 2011

    राजकमल जी विचारों का लावा बहुत दिनों से एकत्र हो रहा था……आज सम्हाला नहीं तो फट पड़ा……और चातक जी के तो कहने ही क्या , आज कल वैसे भी फार्म में हैं….

Jagran Junction Forum के द्वारा
July 13, 2011

आदरणीय अनूप पाण्डेय जी, जागरण जंक्शन फोरम द्वारा जारी किए गए मुद्दे पर आपके सवालों के समाधान प्रस्तुत करना आप सहित सभी पाठकों के हित में है. अतः निवेदन है कि नीचे दिए गए समाधान को अवश्य पढ़ें: 1. जागरण जंक्शन फोरम जनहित और राष्ट्रहित को दृष्टिगत रखते हुए सार्थक वाद-विवाद का मंच है. 2. स्वभावतः फोरम में प्रस्तुत विषय प्रायः विवाद या मतभेद की गुंजाइश वाले होते हैं. 3. यदि कोई मुद्दा जिस पर अनेक मत हो सकते हैं, तो सटीक और युक्तियुक्त मत क्या है, इसे दुनियां के सामने लाना फोरम का अभीष्ट है. 4. लोकतांत्रिक राष्ट्र की भावना के अनुरूप पक्ष और विपक्ष के मत को सामने लाकर ही सर्वाधिक सही समाधान को तलाशा जा सकता है. 5. तथ्यों से मुंह फेरने की बजाय उसका हिम्मत से सामना कर सच को प्रतिष्ठापित करना ही वास्तविक बौद्धिकों का धर्म है और ऐसा करके ही छद्म वेशधारियों का पर्दाफाश किया जा सकता है. 6. यही कारण है कि मंच ऐसे सभी मुद्दों को जनता के सामने रखता है जिन पर बहस हो, गैर-राष्ट्रवादी व देशद्रोही विचार वालों को बहिष्कृत किया जा सके, राजनीति व समाज में नैतिक आचार संहिता को बल मिले व अंतिम तौर पर भारत राष्ट्र का गौरव बढ़े. जागरण जंक्शन पर ब्लॉगिंग के लिए आपका आभार धन्यवाद जागरन जंक्शन परिवार

    vasudev tripathi के द्वारा
    July 13, 2011

    अनूप भाई सर्वप्रथम तो आपको सीधे खरे और सटीक लेख पर हार्दिक बधाई, अब बात जागरण की जिसने यहाँ अपना उत्तर (सफाई) प्रस्तुत की आकर| परस्पर भिन्न मत विचारों बाले विषय प्रस्तुत करने करना मीडिया का धर्म है और इसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता किन्तु जब कई बार विषय एकतरफा हो जाएँ अथवा उनके तल में कोई आधार ही न हो क्या तब भी उसे सार्थक ही कहा जाना चाहिए.? मंदिरों की जो संपत्ति भक्तो के दान से एकत्रित हुई हो उसपे या तो भक्तों का ही अधिकार हो सकता है अथवा मंदिर का ही..! सरकार और अल्पसंख्यक कल्याण विभाग का हक़ वहां कहाँ से हो सकता है.? अपनी संपत्ति का उपयोग कहाँ और कैसे हो यह मंदिर या भक्त ही तय करेंगे या सरकार के वोट तृषित नेता..? पद्मनाभ जैसी अमूल्य पुरातात्विक महत्व की धरोहर को अनुचित जड़ पड़ी संपत्ति बताने वालों को हमारे पर्वत नदियाँ प्राचीन इमारतें अजंता एलोरा की गुफाएं सब कुछ बेचने की बहस करनी चाहिए इसके खरबों विदेशी डालर विदेशी बाजार में मिल जायेंगे…….. अंत में संक्षिप्त में जागरण के माध्यम से मीडिया से एक सवाल..- इन सब तथ्यों के बाद भी आपकी बहस सार्थक मान ली जायेगी किन्तु हजारों सवालों के बाद भी बहस के केंद्र में हिन्दू मंदिर और उनकी संपत्तियां ही क्यों मस्जिद मदरसा वक्फ और चर्च की अकूत संपत्तियां क्यों नहीं..? जब तक इस यक्ष-प्रश्न का ईमानदार उत्तर नहीं दिया जाता सारी सफाई बेईमानी से अधिक कुछ नहीं..! पाठक इस विषय पर अधिक जानना चाहें तो अधिचर्चित में मेरा लेख हिन्दू निशाने पर देख सकतें हैं|

    anoop pandey के द्वारा
    July 14, 2011

    आदरणीय जागरण जंक्शन संरक्षक मंडल, सादर अभिनन्दन , आपकी प्रतिक्रिया पर कुछ आपत्तियां है…..पहली तो ये की यदि आप जागरन जंक्शन परिवार है तो हम सभी ब्लोगर क्या हैं? आप और हम मिल कर इस परिवार का निर्माण करते हैं…..अतः यदि हमें गृह निकाला मिला है तो स्पस्ट करें. दूसरी बात मंच सभी मुद्दे न रख कर सिर्फ चालू मुद्दे ही बहस के लिए प्रस्तुत करता है. यद्यपि जागरण के राष्ट्र धर्म और भारत राष्ट्र के उत्थान की मंशा को ले कर कोई सवाल नहीं है फिर भी आपसे और सटीक एवं राष्ट्र चिंतन से भरपूर मुद्दों की अपेछा पाठक समूह रखता है. फोरम में प्रस्तुत विषय प्रायः विवाद या मतभेद की गुंजाइश वाले हों ये तो ठीक है पर प्रमुख आपत्ति उनके शीर्षकों को ले कर होती है जैसा की निशा मित्तल जी भी कह चुकी हैं. शीर्षक अक्सर दुराग्रह प्रकट करते हैं जिनसे की बचना चाहिये.यदि मंदिर धनवान जनता निर्धन के स्थान पर धार्मिक स्थल धनवान जनता निर्धन शीर्षक होता तो आज जैसी परिस्थिति न आती.तथा फोरम आहूत करने के लिए दी गयी विषय वस्तू से मंच की राय तटस्थ न रह कर एक ओर झुकी लगती है….अतः यदि मंच स्वयं एक पक्ष है तो उसे छोड़ा कैसे जा सकता है. महोदय मैंने अनुचित शब्द का उपयोग किया है न की अनैतिक या अवैध. अनुचित इसलिए की जागरण का आयास सिर्फ उत्तर भर में है और केरल के लोगों की भावना की चर्चा करना सिर्फ कयास लगाने जैसा है……ये विषय फोरम पर उठा कर आप पाठकों के बीच गरमा गरम बहस का मज़ा तो ले सकते हैं पर उसकी सार्थकता क्या होगी ये कहना मुश्किल है. जिन लोगों से ये विषय सीधे जुड़ा है उनमे से कोई अपना पक्ष यहाँ रख पायेगा उसकी सम्भावना न्यूनतम है. और यदि कोई सटीक और युक्तियुक्त मत निकला भी तो उससे होगा क्या? क्या दूसरे पक्ष तक ये बात पहुचेगी की इस फोरम का निर्णय आपके विपरीत है…..यदि अंत में होना कुछ भी नहीं है तो फिर फोरम का फायदा ही क्या? और फिर ऐसे विषय की सार्थकता भी क्या जो पाठकों के धार्मिक या सामाजिक मनोभावों से छेड़ छाड़ करे. बंधुवर जागरण प्रति दिन कई लोगो के विचारों को भोजन प्रदान करता है……लेखों के द्वारा हम अपनी मानसिकता का निर्धारण करते है. अतः वैचारिक सुचिता बनाये रखने की जो जिम्मेदारी आप पर शीर्ष स्थान में आने के बाद आ गयी है उसका भार महसूस करें तो ऐसी चूक होने की सम्भावना घट जाएगी. जागरण सन ८० से घर पर प्रति दिन आ रहा है अब तो भावनात्मक जुड़ाव हो गया है……इस वजह से उसे चूकते देख भाषा में तल्खी आ गयी…….उसके लिए क्षमाप्रार्थी हूँ. आभार अनूप कुमार पाण्डेय

    anoop pandey के द्वारा
    July 14, 2011

    वासुदेव जी जब बड़ों से साथ छोड़ा तो भी युवा वर्ग साथ था देख कर हर्ष हुआ….हार्दिक आभार.

chaatak के द्वारा
July 13, 2011

अनूप जी, बिलकुल सही सवाल उठाया है आपने, मीडिया के पास इस समय धन बरस रहा है (वो भी हर रंग का), मंदिर ही क्यों हर चर्च और हर मस्जिद के पास अकूत संपत्ति है और इससे भी ज्यादा संपत्ति नेताओं के पेट में तो प्रशांत महासागर (या इससे थोडा ही अधिक) के बराबर धन पड़ा है| बहस पूरी होनी चाहिए इस तरह की अधूरी बहस ले कोई दिशा भी नहीं मिलेगी| कुछ दिन पहले इस विषय के पोल से यह बात स्पष्ट है कि ज्यादातर लोग मंदिर की संपत्ति से छेड़-छाड़ नहीं चाहते| वैसे जिन पहलुओं पर आपने सवाल उठाया है उनपर एक सार्थक बहस हो सकती है| मैं आपका समर्थन करता हूँ| उचित सवाल उठाने पर आपको हार्दिक बधाई!

    anoop pandey के द्वारा
    July 13, 2011

    चातक जी धन्यवाद……आशा है मंच पर सत्य की मशाल आपके सहयोग से यूँ ही जलती रहेगी…

Santosh Kumar के द्वारा
July 13, 2011

आदरणीय अनूप जी , अत्यंत सार्थक लेख ले लिए बधाई , सरकार ….मीडिया …..कथित सेकुलरवादिओं इन सबको केवल मंदिरों , संतों , ट्रस्टों का धन ही दिख रहा है ……यह सब असली काले धन के मुद्दे से जनता का ध्यान बताने की कोशिश है …………….

    anoop pandey के द्वारा
    July 13, 2011

    संतोष जी धन्यवाद . भारत के मंदिरों को सदियों तक विदेशियों ने लूटा……पर ये चमत्कार पहली बार हो रहा है की अपने ही उन्हें लुटा रहे हैं………मंदिर की सम्पदा सरकार के हाथ लगी तो किसी दिन किसी विदेशी दूकान में बिकती हुई दिखेगी.

Manoj Dublish के द्वारा
July 13, 2011

बहुत सार्थक लेख!! पहली बात तो यह जागरण एक अखबार है या न्यायाधीश ?और दूसरी बात की लोगों को उपदेश करने से पहले खुद क्या किया ?क्या किसी अखबार के दफ्तर के बाहर प्यायु लगी है जो प्यासे लोग पानी पी सकें क्या कोई पानी की हौज लगी है जो प्यासे पशु पानी पी सकें ?क्या कभी सोचा है पाखंडी ज्योतिषियों , तांत्रिकों ,सेक्सोलोजिस्टों,मित्र बनाओ आदि व्ग्यापनों से जनता को कितना नुकसान होता है/ ज्यादातर अखबार नकारात्मक ख़बरों से ही लबालब होते हैं क्या देश में कहीं कुछ अच्छा होता ही नही ? देश में एक मन मोहन सिंह ही ईमानदार हैं और सारे बेईमान ? देश में एक ही पार्टी है कांग्रेस और एक ही परिवार है सोनिया गाँधी का ,बाकी तो सारे यहाँ ऐसे ही बस गये हैं/ राहुल गाँधी यहाँ का युवराज है और शेष भारत उसका गुलाम / यह सब मीडिया का परचार और प्रसार है जिसके कारण अपराधियों को लोकप्रियता मिल रही है /मंदिर का खजाना किसका है इसका ठेका मीडिया का है क्या ?मंदिर के खजाने को तो देख रहे हो नेताओं के खजाने को क्यों नही ? राष्ट्रगान में आपत्ति जनक रूप से किंग जार्ज पंचम को भाग्य विधाता गाते गाते तरेसठ साल हो गये क्या आज भी वही भारत का भाग्य विधाता है? केवल एक परिवार के आगे सारा मीडिया नतमस्तक है पता नही क्यों ?शायद विकिलीक्स से खुलासा हो सके.परन्तु कब ???

    anoop pandey के द्वारा
    July 13, 2011

    दुबलिश जी जब विकिलीक्स की बात आ ही गयी है तो एक बात आपसे साझा करता हूँ. आज से ९ माह पहले जब मै भारत आया तो इस मंच पर आने के लिए जागरण सर्च किया…..विकिपीडिआ में जागरण की खासी बदनाम छवि देख हैरान हुआ…..पैड न्यूज़ के बारे में थी……अभी कुछ दिन पहले जब फिर से वो ही साईट खोली तो जागरण की बड़ाई से पेज पटा हुआ देखा…..साथ में एक स्टार भी मिला था……ऐसा आमूल चूल परिवर्तन सिर्फ ८ माह में किस जादू की छड़ी से हुआ ? ये तो है जागरण…….पर हमें उससे क्या? हमारा प्रयास सिर्फ मीडिया में भेडचाल रोकने का है. अरे कुछ लोग देश को डूबा रहे हैं….अगर आप उबार नहीं सकते तो कम से कम कश्ती में छेद तो मत करो…

Dr. SHASHIBHUSHAN के द्वारा
July 13, 2011

अनूप जी, आपकी सोच इतनी अच्छी नहीं है। टाटा या अम्बानी या उन जैसे व्यापारियों का पैसा व्यापार में लगा है, जिससे लाखों लोगों की जीविका चल रही है। वह प्रवाहित पूँजी है। उसका लाभ देश की जनता को भी मिल रहा है।  लेकिन यह जो सम्पत्ति है, वह जड़ रूप में है। अगर इस पूँजी को  आधार बनाकर कोई सार्थक कार्य हो सके जिससे करोड़ो लोगो का भला हो तो उसमें कोई बुराई नहीं है। अपनी सोचों को और विस्तृत करें, दूसरे की बुराई नहीं अपनी भलाई की बात सोचें।

    anoop pandey के द्वारा
    July 13, 2011

    शशिभूषण जी जड़ रूप में तो इस संपत्ति से ज्यादा सोना देश के लोगो के घरों में है…उससे भी ज्यादा काला धन है जो की प्रवाहित तो है पर अपने देश में नहीं…..बात यहाँ धर्म की है. लोगो के विश्वास की है…..मै इस बात का हिमायती नहीं की वो पैसा वैसे ही पड़ा पड़ा सड़ता रहे पर इस बात का विरोधी अवश्य हूँ की किसी वर्ग विशेष के धार्मिक स्थलों की संपत्ति का सरकारी अधिग्रहण हो जब की सरकार में उस पैसे का क्या होने वाला है वो सभी को पता है. मंदिर के नियमो में ये व्यवस्था थी की आपदा के समय तहखाना खोला जाये……इसे सम्प्रदाय विशेष का बचत खाता समझा जा सकता है………और कृपा करके ये बताएं की करोंडो का भला किस प्रकार हो सकता है? माध्यम तो आखिरकार सरकार ही बनेगी तो फिर दान के पैसे का बंदरबांट तय है. जो भी करना है उसे ट्रस्ट को करने दीजिये……जब इतना पैसा इनकम टैक्स से आता है तो तो देश का भला आज तक न हुआ…..हाँ कुछ बहुत नातों का जरूर से हुआ तो इस पैसे से देश का भला हो जायेगा कैसे मान लें. दूसरी आपत्ति इस बात से है की सिर्फ मंदिर और साधू संतों के पैसे पर ही नज़र क्यों? आजमगढ़ में पेट्रो डालर से बनी आलिशान मस्जिदों, दूसरी जगहों की मजारों, केरल से ले कर बम्बई तक के चर्चों , उनसे संचालित स्कूलों की बात क्यों नहीं? और साहब जिन धनाधीशों के व्यापार चल रहे है क्या उनके पास कुछ भी नहीं? जीविका तो रामदेव के व्यापार से भी कई लोगों की चल रही है……फिल्म स्टारों क्रिकेट खिलाडियों के पास भी तो बहुत पैसा है उससे भी क्या बहुत से लोगों की जीविका चल रही है…..

    anoop pandey के द्वारा
    July 13, 2011

    तथा शशिभूषण जी कब तक सिर्फ अपने स्वार्थ की सोचे रहेंगे? सिर्फ अपना उल्लू सीधा करने के कारन आज हिन्दुस्तान में हिन्दू ही तान दिया गया है…….अपनी भलाई करने को भगवान् ने दो हाथ दो पाँव दिए हैं…..अब उनके पैसे पर डाका डालूँ इतने बुरे दिन नहीं आये….


topic of the week



अन्य ब्लॉग

  • No Posts Found

latest from jagran