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एक पाती जे जे और ब्लोगर्स के नाम

Posted On: 21 May, 2012 Others,लोकल टिकेट में

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कैसे कैसे मंजर सामने आने लगे हैं
गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैं.
दुष्यंत जी की ये पंक्तिया कहने को मै विवश हूँ आज…….हालत ऐसी बना दी है आप लोगो ने…..मंच में आप दो पार्टी बना कर चल दिए है किन्तु मेरी समझ से मंच के तीन अंग है ; पहला नियामक या व्यवस्थापक जो की जे जे स्वयं है. दूसरा ब्लोगर्स तथा एक तीसरा अंग भी है जो की मूक होने के कारण नजरअंदाज होता रहता है. वो है ‘पाठक’. मै इसी जमात का प्राणी हूँ. समयाभाव के कारन या की अपनी छुद्र बुद्धि के कारन ब्लॉग नहीं लिखता पर नियमित पाठक अवश्य हूँ. आज ब्लॉग सिर्फ इस लिए लिख रहा हूँ क्यों की बाकि दोनों अंग अपना काम सुचारू ढंग से नहीं कर पा रहे हैं या कहें की हमारी अपेक्चाओ पर खरे नहीं उतर पा रहे हैं.
सर्व प्रथम बात सम्पादक मंडल से ………… राम कथा की व्याख्या में सुना था की भक्ति बंदी और समाज मौन तो लंका में आग लग जाती है. आज आपके मंच की यही हालत है और आप सभी चुप हैं. मंच का अभी भी शैशव काल है और विचार कलुषित होने लगे है……भाषा पतित हो रही है किन्तु सिर्फ कमेन्ट की टी आर पी की वजह से अयोग्य ब्लॉग भी विभिन्न श्रेणियों में अपनी जगह बना रहे है .इस प्रकार ही चलता रहा तो मंच सार्थक वैचारिक मंच के पद से च्युत हो जायेगा. आपके लिए एक ही सन्देश है,
मुखिया मुख सो चाहिये खान पान को एक,
पालहिं पोसहीं सकल अंग तुलसी सहित विवेक.
मेरा जोर ‘ विवेक ‘ शब्द पर अधिक है. बुद्धि और ज्ञान से ऊपर की वस्तु है. अत एव कृपया दूरगामी परिणामो को ध्यान में रख कर आप अपने विवेक का प्रयोग करें . यदि कोई ब्लॉग ऐसा है जिससे की मंच की गरिमा को ठेस पहुचे तो वो मंच पर न आ सके बल्कि पुनर्विचार के लिए ब्लोगर को भेज दिया जाये. आचार्य महावीर प्रसाद जी ने सम्पादन के लिए कठोर माप बनाये थे कृपया प्रेरणा लें.

अब बात ब्लोगर बंधुओं से , सबसे पहले वरिष्ठों से……मान्यवरों आज से डेढ़ साल पहले मै आप सभी के सानिध्य में आया और लेखनी पकडनी सीखी.निशा जी; अलका जी; शशि भूषन जी; राज कमल जी; भ्रमर जी ; विक्रमजीत जी;वासुदेव जी ; चातक जी वाजपई जी और भी अन्य अग्रज थे जिनका की स्नेह मिला…..कुछ गलत लिखा तो झिडकी भी मिली. तीखे व्यंग; ज्वलंत मुद्दे ;सार्थक लेखन यही मंच की पहचान थी . कभी कभी ऐसे लेख जो झकझोर देते थे…….पर व्यक्तिगत कुछ कहना हो तो इशारों से काम चलता था. क्योकि शालीनता की सीमा होती है…..एक बार बात पटरी से उतरी तो किस हद तक जाएगी कहना मुश्किल है….और शर्म काठ की पतीली होती है जो बार बार नहीं चढ़ती .
मै चार साल तक एक एकादमी में था…..सीनियर्स का पहला काम जूनियर्स को संस्था के तौर तरीके सिखाना था. उनकी आलोचना करना नहीं, यदि बच्चा कुछ गलत करे तो परिवार भी कहीं न कहीं दोषी होता है. तुलसी बाबा कहते हैं

छमा बदें को चाहिये छोटेन को उत्पात….

यदि कोई उद्दंडता से अपने गुणधर्म का त्याग कर रहा है तो आप तो अपने धर्म का निर्वहन करें……….जे जे का अपना कुछ भी नहीं है इस मंच पर सारा कुछ आप लोगों की लेखनी का प्रताप है…..यदि मंच पर ऊँगली उठी है तो वास्तव में आप पर इशारा है…..यदि आप अपनी जिम्मेदारी से मुह मोड़ लेते हैं तो आप बासी हो जायेंगे और ” प्रकृति के यौवन का श्रृंगार करेंगे कभी न बासी फूल…”

अब बात अपने नए मित्रों से…मित्रों एक सुभाषित था ” विद्या विवादाय धनं मदाय शक्ति परेशाम परपिदनाय” ये बुरे लोगों की पहचान है…..आप में सामर्थ्य है ये आप सभी के लेखों में दीखता है पर तैरने का एक तरीका होता है………किसी भी तरह से बस हाथ पाँव चलने है तो आप तैर नहीं सकते हाँ थक कर डूब जरूर सकते हैं. गोपाल दास जी ने एक ऐसी ही सभा के बारे में कहा था की ” न पीने का सलीका है और न पिलाने का सहूर ” ऐसा न हो पाए………..मंच नयी प्रतिभाओं को हाथों हाथ लेता है….आप पर भी जिम्मेदारियां हैं…..अन्यथा लोगों के लिए आपकी दशा ” विष रस भरा कनक घट जैसे ” वाली हो जाएगी. छोटों पर अधिक बंदिशे उनके भले को होती हैं…..आज की बहू कल सास जरूर बनती है तब नयी बहू उससे ये न पूछ दे की तुमने अपनी सास के साथ क्या किया इस लिए बहू का आचारण आज अच्छा होना ही चाहिये. और फिर “जेते नीचे हुई चले तेतो ऊचे होय” की बात भी तो है……….

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32 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

follyofawiseman के द्वारा
May 22, 2012

अनूप पांडे जी, नमस्कार,….. किसी कमजोर शायर ने गया है, ”अगर ये डर है तुझको वो तुम से तू कर दे, तो मशवरा है मेरा ख़त्म गुफ़्तुगु कर दे…” आपकी विचार धारा भी मुझे कुछ इस तरह की ही प्रतीत हो रही है….लेकिन कब तक कच्चे मकान मे रहिए गा…..? 5000 साल हो गए इस तरह बंद रहते रहते……… बाहर निकलिए और खुली हवा मे साँस लीजिए……कब तक छुद्र बुद्धि बन हाय संस्कार हाय संस्कार करते रहिएगा….अब समय आ गया की हम बुद्धिमान बने…….आप ख़ुद को छुद्र बुद्धि कहते है…कोई ख़ुद को मूरख कहता तो कोई किसी के चरणों की धूल है…..कब तक ख़ुद को कोसते रहिएगा…..धूल बन के जीना भी कोई जीना है….और ध्यान रहे धूल पर कोई दया भले ही कर दे लेकिन इज्ज़त कभी नहीं करेगा…….ऐसी इज्ज़त की क्या मोल जो ख़ुद की निंदा करके आती हो….आदमी जब सच मे ही इज्ज़त के काबिल हो सकता हो इज्ज़त की भीख माँगने की क्या ज़रूरत……..। झटक दीजिए ये संस्कारों की धूल….और इन सड़े-गले दोहों को….ये सब कमज़ोर आदमी की ईज़ाद…है……. “मैं अपने आज से हारा कोई बाजी नहीं होता, अगर लिपटा हुआ मुझसे मेरा माजी नहीं होता, ज़रूरी है कदूरत भी दिलो से साफ हो पहले, फकत सर के झुकाने से ख़ुदा राजी नहीं होता…..”

    May 22, 2012

    हाँ…..हाँ….हाँ….. ओह्म अशान्तिः…..अशान्तिः….अशान्तिः….!………

    anoop pandey के द्वारा
    May 22, 2012

    संदीप जी नमस्कार……….तथा स्वागत. आपके ब्लॉग देखे अधिकतर सुन्दर थे…….बधाई. अब आपकी बात का उत्तर……..हवा खुली और साफ़ है बस महसूस करने की बात है. और डर तो बस पिता जी और पत्नी जी से लगता है बाकी किसी से क्या डरना ……… और मज़ा तो तब है न की दूसरे तारीफ़ करें खुद के मुह मिया मिट्ठू क्या बने? जहा तक इज्ज़त की बात है तो वो तो दे कर ही मिलती है……आशा है की भविष्य में भी आपके अच्छे आलेख दीखते रहेंगे.

    anoop pandey के द्वारा
    May 22, 2012

    @ अनिल जी ……छोटी सी प्रतिक्रिया से काम चला लिया……बहुत पहले आपके सुरुवाती लेख देखे थे और नवीनतम ब्लॉग भी देखा…….बदलाव बहुत ज्यादा है……..कारन तो आप ही बता सकते हैं . स्वागत तथा आभार.

    follyofawiseman के द्वारा
    May 22, 2012

    “डर तो बस पिता जी और पत्नी जी से लगता है बाकी किसी से क्या डरना”  पिता जी और पत्नी से दर इसलिए लगता है क्योंकि उनसे प्रेम नहीं है…..प्रेम अगर प्रकाश है तो डर अंधकार…..प्रेम और डर दोनों का मिलन संभव नहीं है…… “जहा तक इज्ज़त की बात है तो वो तो दे कर ही मिलती “ 1.अगर बात ऐसी है तो बात राजनीति की हो गई….. 2. इज्ज़त/प्रेम होगा हमारे पास तब तो देंगे……जो है ही नहीं वो देंगे…..कैसे…….कौन किसको इज्ज़त देता है…..बस अभिनय करतें है लोग……भीतर मन कर रहा होता है गली देने का ऊपर से मुस्कुराते रहते है…लोग…….हम इतने सूक्ष्म रूप से पाखंडी हो चुके है कि हमे पता भी नहीं चलता है कि हम पाखंडी है…… जो ख़ुद कि इज्ज़त नहीं करता है ख़ुद से प्रेम नहीं करता है….ख़ुद की तारीफ नहीं करता है…..वो दूसरों की क्या करेगा……किसी की चाटुकारिता करना उसको इज्ज़त देना नहीं है…….

    anoop pandey के द्वारा
    May 22, 2012

    हा हा हा संदीप जी…..अच्छा है………बहुत अच्छा है………चलिए आप जीते हम हारे………अब तो प्रसीदतु प्रभो…..मै आप से तर्क का नहीं अपितु अच्छे ब्लोग्स का अभिलाषी हूँ. पुनः आभार

    follyofawiseman के द्वारा
    May 22, 2012

    अभी मैंने दो दिन पहले ‘सेक्स, समाज और साधू’ पोस्ट किया है उसको पढ़िए…..वन ऑफ माइ बेस्ट पोस्ट है…..

    May 22, 2012

    ham to kal bhi vaise the aur aaj bhi vaise hi hai. jahan tak rahi baat mere aalekh ki to wo kal bhi na mere the aur na aaj bhi mere hain. jo samaj se milata hai use saamane rakhata jata hun. aapane ek baat suni hofi pratyek kriya ke saman parantu viprit disha men pratikriya hoti hai….samaj apana swarup badal le, mera aalekh bhi badal jayega…..! chaliye jab aap mitra ke saamane aatm samarpan kar diye hain to hare hue se yudh kya karana. mitra sandip, yadi koi vyakti ladane se pahile hi hathiyr daal de to wo vipaksh aur paksh dono ke liye khatara ho sakta hai…atah aise vyakti ko bandi banakar karagar men daal dena chahiye sadane ke liye……to pandey ji ko bandi banaon aur le chalon inko apane dere par…..! aur dusare yodhaon ki taraf apana rukh karo……!

    anoop pandey के द्वारा
    May 23, 2012

    संदीप जी वो ब्लॉग तो आपके पोस्ट करते ही देख लिया था ………. पर अभी तक उसकी एडिटिंग ही चल रही है शायद.

    dineshaastik के द्वारा
    May 23, 2012

    संदीप जी वाह क्या दिमाग  पाया है, तर्क  भी नत  मस्तक  हो जायें आपके सामने तो। भाई मेरा तो पुनर्जन्म में विश्वास  नहीं है, अन्यथा यही समझता कि आइन्सटाइन का पुनर्जन्म हो। विद्रोह  के साथ साथ सामान्जस्य भी बना के चलिये, तभी आपके विचार  सत्ता रूढ़ होंगे।

    follyofawiseman के द्वारा
    May 23, 2012

    नहीं अब समाप्त हो चुकी है…..आप पढ़ सकतें है…..!

    anoop pandey के द्वारा
    May 23, 2012

    दिनेश जी सादर नमन. संदीप जी की वय अभी कम है…..कुछ बाते व्यक्ति में उम्र के साथ आती हैं …… जैसे की अकल दाढ़…….इसे मैचुरिटी कहते है. वो कहते है न ” नौजवानों की मजबूरियां है, सोचते कम समझते बहुत हैं” तो इनको भी थोडा समय दीजिये. प्रतिभा है और जिस दिन प्रौढ़ता आ गयी तो सोने पर सुहागा.

    May 24, 2012

    परन्तु बड़े न ही सोच पते हैं और न ही समझ पते हैं. बस मस्तिष्क को स्थिर करके खुद को ज्ञानी और अनुभवी बताते हुए ………..मान-सम्मान की आशा करते हैं. नही यदि आप हमसे बड़े हैं तो स्वाभाविक सी बात है आपका सम्मान करना परन्तु आप ज्ञानी और अनुभवी बनकर इसे पाना चाहते हैं तो आपको सिद्ध करना पड़ेगा कि आप जिन् विधाओं में उनसे बेहतर खुद को समझते हैं. वास्तव में आप उसमे बेहतर हैं.

चन्दन राय के द्वारा
May 22, 2012

मित्रवर , अच्छी सोच का अच्छा आलेख

    anoop pandey के द्वारा
    May 22, 2012

    धन्यवाद् मित्र.

jlsingh के द्वारा
May 22, 2012

आदरणीय पांडे जी, सादर अभिवादन! रात के अँधेरे में आपकी तस्वीर (चेहरा) नहीं दीख रहा था पर दिन के उजाले में तो आप धरती और आकाश के बीच खड़े मुस्कुरा रहे हैं …… आपका यह ब्लॉग बहुत ही उचित और समयानुकूल संदेशा लेकर आया है ….. उम्मीद है आगे से माहौल खुशनुमा होगा!.. आपका आभार!

    anoop pandey के द्वारा
    May 22, 2012

    आदरणीय जवाहर जी स्वागत एवं अभिनन्दन, पहले अवतार लोड नहीं हो रहा था फिर ब्लॉग लिखने का समय न था , इस बार सोचा परदे के पीछे रहना ठीक नहीं तो बस रात ख़राब कर दी. माहौल खुशनुमा हो तो अच्छे विचार आते हैं, सोच ये थी सन्देश के पीछे. आशा वादी हूँ तो लगता तो है की सब ठीक हो जायेगा. पुनः धन्यवाद्.

Rajkamal Sharma के द्वारा
May 21, 2012

आदरणीय अनूप जी ….. सादर नमन ! सबसे पहले तो इस बेहतरीन लेख के लिए इसके लेखक को मेरी तरफ से भी मुबारकबाद बहुत याद करना पड़ा की आप वास्तव में थे कौन ?….. फिर आपकी सभी पोस्ट पर अपने और दूसरे ब्लागर्स के सारे कमेन्ट पढ़े तब कहीं जाकर आपकी बाबत पता चला ….. आपको कहीं पर कभी हम लोगो ने कभी भूलवश कुछ समझाने की चेष्टा अवश्य की होगी – लेकिन कोई झिड़की ना बाबा ना ! अब देखिये ना आप भी तो जागरण को कुछ समझा रहे है तो क्या इसको भी आपके द्वारा जागरण को दी गई घुड़की मान लेना चाहिए – नहीं ना – की हाँ – हा हा हा हा हा मुझको तो ऐसा लग रहा है की आप शायद अपनी राजकमल सास के बारे में अपनी होने वाली और हो चुकी बहुओं से मेरे द्वारा किये गए अतीत में जुल्मों सितम की बाते इसलिए बताना चाह रहे है ताकि आपको भी अपनी बहुओं को झिड़कने का अधिकार मिल जाए और वोह सभी बिना कोई चूं चपड़ किये हुए आपकी झिड़किया + घुड़किया प्रसाद समझ कर ग्रहण कर जाए :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-)

    anoop pandey के द्वारा
    May 22, 2012

    आदरणीय राजकमल जी, पुनः स्वागत है आपका. न पहचानने का दोष आप पर नहीं है….पांच महीने बाद जब मै घर वापस आता हूँ तो खुद का बेटा भी नहीं पहचानता…भला हो फोटो फ्रेम करने वालों का की हर कमरे में अपनी फोटो लगा दी है और बिना कोई बदलाव किये उसी चेहरे में घर आता हूँ……कहीं ऐसा न हो की वो किसी और को पापा कहने लगे……….प्रतिक्रिया के लिए आभार.

dineshaastik के द्वारा
May 21, 2012

आपकी सटीक  और तार्किक  बातों से पूर्णतः सहमत।

    anoop pandey के द्वारा
    May 22, 2012

    दिनेश जी स्वागत एवं आभार .

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
May 21, 2012

sahmat

    anoop pandey के द्वारा
    May 22, 2012

    धन्यवाद् आदरणीय प्रदीप जी .

vikramjitsingh के द्वारा
May 21, 2012

पूर्णतया सहमती……..

    anoop pandey के द्वारा
    May 22, 2012

    आभार आदरणीय विक्रमजीत जी. तथा आप पुनः पहले जैसे सक्रिय हो जाये इसका निवेदन. अच्छा लगेगा जब मिल बैठेंगे तीन यार आप मै और हमारा …………

nishamittal के द्वारा
May 21, 2012

पाण्डेय जी ,आपकी बातों से सहमत ,परन्तु इस समय आवश्यकता है,सभी को सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हुए अपनी लेखन शक्ति का सदुपयोग करने की चाहे वो किसी भी विधा में हो और कुछ कदम मंच के व्यवस्थापकों द्वारा उठाये जाने की.

    anoop pandey के द्वारा
    May 22, 2012

    मै भी आपसे पूरी तरह सहमत हूँ निशा जी. किन्तु बात कुछ इतनी लम्बी खीच गयी और लेख इतने अधोस्तरीय आने लगे की कहना पड़ा. काफी दिनों बाद आप मेरे ब्लॉग पर आयीं अतः सुस्वागतम.

    akraktale के द्वारा
    May 23, 2012

    अनूप जी सादर, आपका कोई आलेख मैंने पहले कभी शायद ही पढ़ा हो. मगर आज जेजे और ब्लोगर्स का नाम होने से मैंने इसे पढ़ा और सच मानिए मुझे आपका सुलझा रूप बहुत ही पसंद आया.इसके लिए आपको अतिरिक्त बधाई. सच कहा है आपने कई दिनों से मंच को कुछ ब्लोगर्स ने मंच के स्तर जितना नीचे गिराया है वह, पिछले एक वर्ष से अधिक हो गया मुझे इस मंच पर, मैंने कभी नहीं देखा है. मुझे आशा थी की जेजे इस पर कोई अच्छा हल निकालेगा किन्तु ऐसा देखने को तो नहीं मिला.तभी आपका कहना भी सही लगा की मंच आपका है जेजे का नहीं,आपको ही सम्हालना है.वरिष्ठ ब्लोगर्स द्वारा काफी प्रयास भी किया गया किन्तु….. खैर अब इस पर कलम घसीटने का क्या अर्थ. आशा है आपकी इतनी ही उन्नत सोच के साथ आपके आलेख भी मै पढ़ पाउँगा. आभार.

    anoop pandey के द्वारा
    May 23, 2012

    आदरणीय अशोक जी, सादर नमन; अतिरिक्त बधाई के लिए अतिरिक्त आभार . मैंने अभी भी अपने पुराने आलेख हटाये नहीं है सिर्फ आप उन्हें पढ़ सकते है …….. अग्रजो का मार्गदर्शन मिलता रहे बस यही आशा है. और आपकी आशा पर खरा उतर सकूँ इसका प्रयास कर रहा हूँ. प्रतिक्रिया हेतु धन्यवाद्.

    anoop pandey के द्वारा
    May 23, 2012

    कृपया ‘सिर्फ’ के स्थान पर ‘अब भी’ कर ले. त्रुटी के लिए क्षमा करें.

आर.एन. शाही के द्वारा
May 21, 2012

मैं आपकी बात से पूर्णतया सहमत हूँ.

    anoop pandey के द्वारा
    May 22, 2012

    आभार आदरणीय शाही जी.


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